कक्षा-10 द्वितीयः पाठः
बुद्धिर्बलवती सदा (PART-03)
जम्बुकः- स्वामिन् ! यत्रास्ते सा धूर्ता तत्र गम्यताम् । व्याघ्र ! तव पुनः तत्र गतस्य सा सम्मुखमपीक्षते यदि , तर्हि त्वया अहं हन्तव्यः इति । व्याघ्रः- शृगाल ! यदि त्वं मां मुक्त्वा यासि तदा वेलाप्यवेला स्यात् । जम्बुकः- यदि एवं तर्हि मां निजगले बद्ध्वा चल सत्वरम् । स व्याघ्रः तथा कृत्वा काननं ययौ । शृगालेन सहितं पुनरायान्तं व्याघ्र दूरात् दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती - जम्बूककृतोत्साहाद् व्याघ्रात् कथं मुच्यताम् ? परं प्रत्युत्पन्नमतिः सा जम्बुकमाक्षिपन्त्यङ्गुल्या तर्जयन्त्युवाच –
रे रे धूर्त
त्वया दत्तं
मह्यं व्याघ्रत्रयं पुरा ।
विश्वास्याद्यैकमानीय कथं यासि वदाधुना ।
इत्युक्त्वा धाविता तूर्ण
व्याघ्रमारी भयङ्करा ।
व्याघ्रोऽपि सहसा नष्टः
गलबद्धशृगालकः ।।
एवं प्रकारेण बुद्धिमती व्याघ्रजाद् भयात् पुनरपि मुक्ताऽभवत् । अतएव उच्यते - बुद्धिर्बलवती तन्वि सर्वकार्येषु सर्वदा ।।
शब्दार्थाः - यत्रास्ते - ( यत्र + आस्ते ) जहाँ है । अपीक्षते - अपि + ईक्षते । ईक्षते - ( पश्यति ) देखती है । हन्तव्यः - ( हन् + तव्यत् ) मारने योग्य । मुक्त्वा - ( मुच् + क्त्वा ) छोड़कर । वेलाप्यवेला - ( वेला + अपि + अवेला ) सत्वरम् - शीघ्रम् । ययौ - गया । पुनरायान्तम् - ( पुनः आयान्तम् ) - फिर से आये हुये । चिन्तितवती - सोचा । जम्बुककृतोत्साहात् - सियार के द्वारा बढ़ाया गया है उत्साह जिसका , उससे जम्बुकमाक्षिपन्त्गुल्या - जम्बुकम् + आक्षिपन्ती + अगुल्या । तर्जयन्त्युवाच -
( तर्जयन्ती + उवाच ) डाँटती हुयी बोली । विश्वास्याद्यैकमानीय - विश्वास्य + अद्य + एकम् + आनीय । । आक्षिपन्ती - आक्षेप करती हुयी / झिड़कती हुयी । तर्जयन्ती - डाँटती हुयी । वदाधुना - वद + अधुना । तूर्णम् - शीघ्रम् । भयङ्करा - जो भय उत्पन्न करती है । गलबद्धशृगालक : - गले में बंधा है सियार जिसके वह । बुद्धिर्बलवती - बुद्धिः + बलवती , तन्वी - कोमलांगी स्त्री ।
हिन्दी अनुवाद - सियार- स्वामी ! जहाँ वह धूर्त स्त्री है , वहाँ जायें । आपके फिर वहाँ जाने पर यदि वह सामने देखती भी है , तो आपके द्वारा मैं मारा जाऊँ ( आप मुझे मार डालें ) बाघ - सियार ! यदि तुम ( वहाँ ) मुझे छोड़कर चले गये तो तुम्हारी शर्त का क्या ? अर्थात् मैं मारा जाऊँगा और तुम भाग जाओगे । मैं तुम्हें मारने के लिए कहाँ से जीवित रहूँगा ? सियार - यदि ऐसा है तो आप मुझे गले में बाँधकर शीघ्र वहाँ चलें । वह बाघ वैसा ही करके जंगल को गया । दूर से ही सियार के साथ पुनः आते हुये बाघ को देखकर बुद्धिमती ने सोचा सियार ने जिसमें उत्साह भर दिया है , ऐसे बाघ से कैसे बचाव हो ? ' उस प्रत्युत्पन्नमति ने सियार को फटकारते हुये और उँगली से डाँटते हुए कहा - ओ धूर्त ! तुमने मुझे पहले तीन बाघ लाकर दिये थे । मुझे विश्वास दिलाकर आज एक ही बाघ लाकर कैसे जा रहे हो ? यह अभी बतलाओ । ऐसा कहकर वह बाघ को मारने वाली स्त्री भयंकर रूप लेकर शीघ्र ही उस पर दौड़ी ( झपटने से गले में बाँधे हुये सियार वाला बाघ भी सहसा वहाँ से भाग आया । इसलिए हे कोमल अंगों वाली स्त्री ! इसीलिए कहा जाता है कि सभी कार्यों में बुद्धि ही बल का कार्य करती है ।
अभ्यासप्रश्ना : -
(1) एकपदेन उत्तरत –
( i ) केन शृगालः हन्तव्यः ?
( ii ) सिंह
: निजगले के बध्नाति ?
( iii ) का प्रत्युत्पन्नमतिः आसीत् ?
( iv ) केषु बुद्धिः बलवती भवति ?
(2) पूर्णवाक्येन उत्तरत
( i ) किम् उक्त्वा व्याघ्रमारी धाविता ?
( ii ) कं दूरात् दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती ?
( iii ) बुद्धिमती कस्मात् पुनः मुक्ता अभवत् ?
(3) यथानिर्देशं प्रश्नान् उत्तरत
( i ) ' पश्यति ' इति क्रियापदस्य समानार्थकं किम् ?
( ii ) ' समीपात् ' इति पदस्य किं विलोमपदं गद्यांशे प्रयुक्तम् ?
( iii ) ' पुनरायान्तं व्याघ्रम्
'
इत्यनयोः पदयोः किं विशेषणपदम् ?
( iv ) ' यदि त्वं मां मुक्त्वा यासि ' इति वाक्ये ' त्वम् ' इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
October 14, 2020 7:16 am
very good