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शिक्षा की संकल्पना जब बनी होगी तो निश्चय ही कुछ विचार इस संकल्पना के अंतर्गत निहित रहे होंगे। जैसे, एक दूसरे से सीखना, परस्पर सहयोग करना, साथ में आगे बढ़ना (चूंकि यह पहले से जान लिया गया होगा कि प्रत्येक व्यक्ति की कार्यक्षमता और दक्षता अलग-अलग हो सकती है) ये सभी बातें मिलकर हमें सभ्य समाज स्थापित करने की ओर ले जाती हैं और इस सभ्य समाज की संकल्पना को ध्यान में रखकर ही विद्यालय का निर्माण किया गया होगा ताकि शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके अर्थात् स्कूल को समाज का पर्याय माना गया। यानि एक सामाजिक संस्थान, जहाँ पर बच्चे सिर्फ एक-दूसरे से सीखते ही नहीं हैं अपितु इस संस्थान की प्रत्येक गतिविधि इस प्रकार से तय की गई होती है कि छात्र और छात्राएँ समाज के बीच स्वयं को बेहतर तरीके से समायोजित कर स्वयं के और समाज के विकास में अपना योगदान कर सकें और इस प्रकार से सभ्य समाज की संकल्पना स्थापित रह सके।
         जिस सभ्य समाज की स्थापना के लिए विद्यालय बनाए गए हैं, वह समाज कुछ नियमों पर चलता है जिनकी झलक संविधान की उद्देशिका में मिलती है। इसमें लोकतान्त्रिक व्यवस्था, विचारों की अभिव्यक्ति, अवसरों की समता तथा राष्ट्र की एकता, अखंडता और बंधुत्व की भावना प्रमुख हैं।
इन नियमों और मूल्यों को बच्चों में स्थापित करने की निर्णायक जिम्मेदारी स्कूल पर आती है क्योंकि यदि सोने के घंटे निकाल दिए जाएँ, तो बच्चे का अधिकांश समय स्कूल में ही बीतता है। इस दृष्टिकोण से विद्यालय की यदि ज्यादा भी जिम्मेदारी ना समझें, तो परिवार के बराबर तो अवश्य ही निर्धारित हो जाती है। शायद तभी माता-पिता और शिक्षकों को सम्मान का दर्जा भी दिया गया है क्योंकि वे ही बेहतर समाज बनाने और बेहतर जीवन जीने के लिए हमें तैयार करते हैं।
               तो अब बात करते हैं समाज के इस सभ्य भविष्य को तैयार करने वाले की, यानि शिक्षक की। इस पूरे प्रकरण का मुख्य बिंदु जिसके बिना किसी सभ्य समाज की संकल्पना पूर्ण नहीं हो सकती है।
शिक्षक ही वह व्यक्ति है जिसके माध्यम से विद्यालय की गतिविधियाँ संचालित होती हैं, परन्तु यह शिक्षक आता कहाँ से हैं? समाज से। उसी समाज से जिस समाज को हम सभ्य समाज बनाना चाहते हैं। सवाल ये है कि क्या वह शिक्षक सामाजिक स्तर पर मुक्त है? बिल्कुल नहीं है और ना ही हो सकता है। वह भी इस समाज के ताने-बाने से बँधा एक प्राणी है। तो बात करनी चाहिए उस पर, जो कि हो सकता है। उसके कार्य क्षेत्र पर, यानि क्या शिक्षक को स्कूल में काम करने की आज़ादी है? क्या वह स्वयं यह तय कर सकता है कि वह अपने छात्रों को कब और कैसे किस पाठ को पढ़ाएगा? किन संसाधनों का उपयोग करेगा आदि आदि। क्या शिक्षक शिक्षण का ही कार्य करता है या अन्य कार्यों में संलग्न है? आज की स्थिति पर यदि गौर करें तो शिक्षक के माध्यम से शिक्षण के अलावा अन्य बहुत से कार्य संचालित कराए जाते हैं।
यदि हम चाहते हैं कि शिक्षा के माध्यम से तर्क और सृजन करने की क्षमता, दूसरों को सम्मान देना, स्वतन्त्र सोच, अभिव्यक्ति और समानता को हमारी आने वाली पीढ़ियाँ बरकरार रखें, तो हमें शिक्षक को उसे उसका कार्य, तर्क व सृजन करने की स्वतन्त्रता देकर दिमागी तौर पर तनावरहित करना होगा क्योंकि आज की स्थिति में शिक्षक लगातार अपने कार्य को स्वतन्त्रतापूर्वक न कर पाने के कारण ही तनाव में है। जिस कार्य के लिए उसे नियुक्त किया जाता है, उसे किनारे कर अतिरिक्त कार्यों का भार जिस प्रकार से शिक्षक के मत्थे मढ़ दिया जाता है क्या इस प्रकार से वास्तव में हम सभ्य समाज की संकल्पना को पूर्ण करवा पाएँगे? यदि मनोवैज्ञानिक तौर पर भी देखें, तो किसी भी सृजनात्मक कार्य, भावात्मक कार्य को करने के लिए तनाव मुक्त और प्रसन्न चित्त रहना बेहद आवश्यक है।
           जो व्यक्ति अपना कार्य करने के लिए स्वयं स्वतन्त्र नहीं है, वह अपने छात्रों को स्वतन्त्रता और सम्मान का पाठ कैसे पढ़ा सकता है? परन्तु फिर भी हमारे शिक्षक अपने कार्य की गरिमा को बहुत बेहतर तरीके से समझते हैं और इसी कारण इन विषम परिस्थितियों के बावजूद बहुत बेहतर कर रहे हैं।
             यह विचारणीय है कि शिक्षक भी उसी समाज से आता है, जहाँ पर लोग कहते हैं कि शिक्षक करते ही क्या हैं? सिर्फ़ आधे दिन का काम ही तो है। शायद इसी विचारधारा के कारण अतिरिक्त कार्यों का भार शिक्षक पर डाल दिया जाता है। पर क्या कभी सोचा गया कि यदि शिक्षक का कार्य इतना आसान है तो शिक्षकों और स्कूलों की आवश्यकता क्यों? यानि यह सभी जानते हैं कि शिक्षण जैसे गम्भीर कार्य को करने के लिए कितनी दिमागी मेहनत की आवश्यकता है, इसीलिए हम अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं परंतु यह स्वीकारना नहीं चाहते कि इस आधे दिन के काम के लिए एक शिक्षक लगातार काम करता है।
              समाज को इस अहम सवाल पर विचार करने की ज़रूरत है कि क्या कोई भी शिक्षक सिर्फ़ शिक्षक दिवस पर कुछ सन्देशों और पुरस्कार का ही अभिलाषी है या फिर वह खुलकर कार्य करने की स्वतन्त्रता पाने का भी हक़दार है।
-    डॉक्टर मधुलिका शर्मा

1 comments:

  1. Hi

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